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وطن کجاست که آواز ِ آشنای تو چنين دور مينمايد؟ اميد کجاست
تا خود
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جهان
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به قرار
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بازآيد؟
| هان، سنجيده باش که نوميدان را معادی مقدر نيست! □
معشوق در ذرهذرهی جان ِ توست
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که باور داشتهای،
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و رستاخيز
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در چشمانداز ِ هميشهی تو
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به کار است.
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در زيج ِ جُستوجو
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ايستادهی ابدی باش
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تا سفر ِ بيانجام ِ ستارهگان بر تو گذر کند،
که زمين
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از اينگونه حقارت بار نميمانْد
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اگر آدمي
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به هنگام
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ديدهی حيرت ميگشود.
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زيستن
و ولايت ِ والای انسان بر خاک را
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نماز بردن;
| زيستن و معجزه کردن;
ورنه
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ميلاد ِ تو جز خاطرهی دردی بيهوده چيست
| هم از آن دست که مرگات، هم از آن دست که عبور ِ قطار ِ عقيم ِ اَستران ِ تو از فاصلهی کويری ميلاد و مرگات؟ مُعجزه کن مُعجزه کن
که مُعجزه
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تنها
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دستکار ِ توست
| اگر دادگر باشي;
که در اين گُستره
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گُرگاناند
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مشتاق ِ بردريدن ِ بيدادگرانهی آن
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که دريدن نميتواند. ــ
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و دادگری معجزهی نهاييست.
و کاش در اين جهان
مردهگان را
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روزی ويژه بود،
| تا چون از برابر ِ اين همه اجساد گذر ميکنيم تنها دستمالي برابر ِ بيني نگيريم:
اين پُرآزار
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گند ِ جهان نيست
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تعفن ِ بيداد است. □
و حضور ِ گرانبهای ما
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هر يک
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(اين آيينهيي که از بود ِ خود آگاه نيست مگر آن دَم که در او درنگرند) ــ
تو يا من،
آدمييي
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انساني
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هر که خواهد گو باش
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تنها
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آگاه از دستکار ِ عظيم ِ نگاه ِ خويش ــ
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تا جهان
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از اين دست
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بيرنگ و غمانگيز نماند
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تا جهان
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از اين دست
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پلشت و نفرتخيز نماند.
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يکي
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از دريچهی ممنوع ِ خانه
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بر آن تلِّ خشک ِ خاک نظر کن:
| آه، اگر اميد ميداشتي
آن خُشکسار
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کنون اينگونه
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از باغ و بهار
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بيبرگ نبود
| و آنجا که سکوت به ماتم نشسته مرغي ميخوانْد.
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نه
نوميدْمردم را
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معادی مقدّر نيست.
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چاووشي اميدانگيز ِ توست
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بيگمان
| که اين قافله را به وطن ميرساند. |
+ پنجشنبه 25 آبان1385/ 18:0  / حسین
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پرنده اي در قفس
تو را به فردايت نويد مي دهد
و تو
تنها ونااميد
تک سکه ي جيبت را
به اميد خرج مي کني
آنگاه پرنده
شاهدانه اي هديه مي گيرد
تا فراموش کند
پرواز را
حتي در قفس
+ چهارشنبه 17 آبان1385/ 15:49  / حسین
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